जिंदगी के सच्चाई से रूबरू हो ~By Gaurav | U Writer

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जिंदगी के सच्चाई से रूबरू हो
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~By Gaurav ✍🏻
Writer | U Writer
कभी इन ज़ालिमों की महफ़िल से बाहर आकर देखो, क्या पाओगे। कुदरत जो सुकून देगी, वो पैसों से नहीं खरीद पाओगे। खुशी को भटकते-भटकते कितना ही तन्हा रहोगे। एक बार ख़ुद को कुदरत के हवाले तो करो, उसके आँचल में ही सुकून का ख़ज़ाना पाओगे। जोड़-घटाव का आँकड़ा सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं है, जैसा तुम सोचते हो। ज़िंदगी का भी अपना ही हिसाब है— जहाँ संघर्ष का जोड़ होता है, वहीं दुख का घटाव होता है। सिर्फ़ अपने कर्मों को कुदरत के हवाले समर्पित करके तो देखो, तब जाकर सुकून की नींद सो पाओगे। अगर ख़यालों का भंडार खुद तक सीमित रखोगे, तो कभी ज़िंदगी का आनंद नहीं ले पाओगे। कलियुग की इस महफ़िल में कौन अपना है और कौन पराया, इसका अंदाज़ा तुम लगा नहीं पाओगे। अगर सबको अपना समझोगे, तो कभी न कभी पछताओगे। जाने दो उन लोगों को, वे क़रीबी जो आज तुम्हारे हैं। अपनी ज़िंदगी शान से जीओ, जो अभी तुम्हारी है। वो लोग आज हैं, कल होंगे या नहीं—कौन जानता है। इस दौर में लोग एक कौड़ी के लिए भी रिश्ता तोड़ देते हैं। बस अपने कर्मों को इस जहाँ पर समर्पित करके तो देखो, गुज़रते वक्त के साथ क्या करिश्मा यह करके दिखाता है।
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