~By Gaurav ✍🏻
Writer | U Writer
ये पसंद और प्यार में इतना फ़र्क है,
ये हमने अब जाना।
जिस पर हमने दिल लगाया,
उसने किसी और को अपना माना।
हमने कुर्बान कर दी सारी आशाएँ,
उसकी ज़िंदगी को जीने देने के लिए।
क्योंकि किसी ने खूब कहा है —
बगीचे में पसंद आए फूल को आदमी अपने हाथों से तोड़ लेता है,
और अगर प्यार की बात हो, वही फूल पर माली जान कुर्बान कर देता है।
उसके प्यार में जो बगीचा मैंने लगाया,
उसमें माली बनना चाहूँगा ।
विश्वास का गुलदस्ता भले ही मेरा न हो,
फिर भी उसको न भूल पाऊँगा।
इंतज़ार रहेगा मुझे उसके लौट आने का,
जब उसकी पसंद तोड़ देगी उसके अरमान।
बुरा नहीं सोचूँगा, हमेशा वह खुश रहे,
तब प्यार मेरा याद आए अगर,
खुद को उस पर कुर्बान करना चाहूँगा।
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