सफ़र मेरा उत्कल तक का
By Gaurav
Poet | U Writer
सितंबर से चार महीने पहले स्नातक पूरा हुआ था,
मन में बस उलझन थी — क्या करूँ, कैसे करूँ, कहाँ जाऊँ था।
हर दिन सवालों में ही बीत रहा था समय सारा,
तभी सितंबर 2024 में उत्कल ने मुझे नया सहारा दिया था।
आँखों में सपनों की चमक उतर आई थी,
और दिल ने पहली बार खुद पर विश्वास किया था,
खुशियाँ थीं, उम्मीदों की रौशनी थी,
लंबे संघर्ष के बाद ये सुबह मिली थी।
नौकरी का ख्याल भी मन में आया,
पर उलझनों ने हर कदम को रुकवाया,
समझ नहीं आता था कौन सा रास्ता सही,
और वक़्त मुझे आगे बढ़ना सिखाता रहा वही।
बहुत सोच-विचार के बाद ये ठाना,
कि मास्टर ही होगा मेरा नया ठिकाना,
सरकारी हो या निजी की हो ये कहानी,
हर राह में थी अनिश्चितता की निशानी।
फिर चुना मैंने सरकारी कॉलेज का आँगन,
जहाँ प्रवेश भी बना मेरी साधना।
सीपैट और ओजेई के कठिन सवाल,
हर दिन ने सिखाया धैर्य का कमाल।
उत्कल और रेवेनशॉ ही थे मेरे अरमान,
कम फीस में मिलती थी शिक्षा की पहचान।
इसी सोच ने मुझे राह दिखाई,
सरकारी कॉलेज ने किस्मत जगाई।
सिर्फ पढ़ाई को बनाया अपना सहारा,
दूर रखा हर भ्रम और हर किनारा,
अंकों ने तय किया मेरा ठिकाना,
मेहनत ने मुझे खुद से मिलवाना।
तीन सेमेस्टर अब पीछे छूट गए,
संघर्ष के पन्ने यादों में जुड़ गए,
दोस्त, गुरु और अकेली राह,
सबने सिखाया चलने का साहस और चाह।
अब बस तीन महीने का फासला है,
और ये सफर अपने अंत के पास खड़ा है,
विदाई फिर से दस्तक देगी द्वार,
पर मैं अब पहले जैसा नहीं हूँ यार।
जहाँ गिरा था, वहीं से उठा हूँ मैं,
जहाँ डरा था, वहीं से बढ़ा हूँ मैं,
अफसोस नहीं किसी मोड़ का आज मुझे,
क्योंकि मैंने सीखना सीखा है खुद से।
क्योंकि आज दिल से कह सकता हूँ मैं—
उत्कल ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है,
क्योंकि आज दिल से कह सकता हूँ मैं—
उत्कल ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है।
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